(कवित्त)
काँटेदार करील के वृक्ष जिस भूमि पर,
काँटेदार करील के वृक्ष जिस भूमि पर,
देता दिखलाई जहाँ खारा जल कूप है। [1]
गारी दे बोलते ब्रजबासी सब आपस में,
अन्न फल हीन धरा खादर कुरूप है॥ [2]
पाकर के छाक छाछ गउयें चराता फिरे,
फिर भी बनाया उसे स्वर्ग से अनूप है। [3]
ऐसा जो मनमौजी मस्त ठाकुर त्रिलोकी का,
रक्षक हमारा वही वृन्दावन भूप है। [4]
- डंडी स्वामी श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती ‘हरे कृष्ण’, वृन्दावन शतक (30)
जिस भूमि पर काँटेदार करील के वृक्ष हैं, और जहाँ हर ओर खारे जल से भरे कूप ही दिखाई देते हैं। [1]
जहाँ ब्रजवासी लोग आपस में गाली देते हुए ही बात करते हैं, और जहाँ की भूमि अन्न-फल से हीन, बंजर एवं कुरूप है। [2]
वहीँ श्री कृष्ण छाछ ग्रहण करके गायें चराते हुए फिरते हैं, परंतु फिर भी उस वृंदावन की भूमि को स्वर्ग से भी सुंदर बनाया है। [3]
ऐसा मस्त मनमौजी, तीनों लोकों का जो ठाकुर है, वही वृन्दावन का राजा, श्री कृष्ण हमारा रक्षक है। [4]

