हंस हंस कंठ लगाय है, मोको मेरी जीव ।
अपनी खण्डित बीड़िका, देहै मोहे अमीव ॥
- श्री वंशी अलि, हृदय सर्वस्व (46)
मेरी प्राणप्यारी, श्री लाड़ली प्यारी जू (श्री राधा), मुझ पर अपनी अनंत करुणा बरसाते हुए हँस-हँस कर मुझे बार बार गले से लगाती हैं और अपने अमृततुल्य खंडित पान (भोग लगाया हुआ) को प्रेमपूर्वक मुझे प्रदान करती हैं।
अपनी खण्डित बीड़िका, देहै मोहे अमीव ॥
- श्री वंशी अलि, हृदय सर्वस्व (46)
मेरी प्राणप्यारी, श्री लाड़ली प्यारी जू (श्री राधा), मुझ पर अपनी अनंत करुणा बरसाते हुए हँस-हँस कर मुझे बार बार गले से लगाती हैं और अपने अमृततुल्य खंडित पान (भोग लगाया हुआ) को प्रेमपूर्वक मुझे प्रदान करती हैं।

