प्यारी रस नैननि छकनि भरी।
प्रीतम कौ मन बस करि जानत, इनकों बान परी॥ [1]
बेपरवाही अति गरबीले, खंजन गति निदरी।
वृन्दावन हित रूप रसिक सों, राखत अराअरी॥ [2]
- श्री वृंदावन दास चाचा जी
श्री प्यारी जू (श्री राधा) के नेत्रों में रस की छकन भरी हुई है। ये प्रियतम के मन को वश में करना जानते हैं। इनको यह अभ्यास ही पड़ गया है। [1]
ये बड़े बेपरवाह और अत्यन्त गर्वयुक्त हैं, इन्होंने खंजन पक्षी के नेत्रों की गति का भी निरादर कर दिया है। श्रीवृन्दावन चाचाजी कहते हैं कि ये रूपरसिक श्री प्रियतम से अड़ाअड़ी रखते ही हैं। [2]

