ऐसी प्रीति देउ किन प्यारी - श्री प्रेम दास जी की वाणी (113)

ऐसी प्रीति देउ किन प्यारी - श्री प्रेम दास जी की वाणी (113)

ऐसी प्रीति देउ किन प्यारी।
छिन छिन पल तुम पद अवलोकौं, ह्वै कै रहौं तिहारी॥ [1]
डमाडोल डोलत मन मेरौ, जहाँ जाय तहाँ ख्वारी।
प्रेमसखी की यही बीनती, राखौ सरन न कीजै न्यारी॥ [2]

- श्री प्रेमदास जी (लाल बलबीर जी के भ्राता), श्री प्रेम दास जी की वाणी (113)

हे प्यारी जू (श्री राधा)! मुझे ऐसी अनन्य प्रीति प्रदान करें कि मैं क्षण-क्षण, हर पल आपके चरणकमलों का ही केवल अवलोकन करती रहूँ और मैं सदा-सर्वदा आपकी होकर रहूँ। [1]

मेरा मन सदा विचलित रहता है, जहाँ जाता है, वहाँ इसकी दुर्गति ही होती है। श्री प्रेमसखी जी विनती करती हैं कि अब बस मुझे अपनी शरण में रखें एवं एक क्षण के लिए भी अपने से अलग न कीजिए । [2]