राधे भई आपु घनस्याम - श्री भारतेंदु हरिशचंद्र, भारतेंदु ग्रंथावली

राधे भई आपु घनस्याम - श्री भारतेंदु हरिशचंद्र, भारतेंदु ग्रंथावली

राधे भई आपु घनस्याम।
आपुन कौ गोबिंद कहत है, छाड़ि राधिका नाम॥ [1]
वैसेइ झुकि झुकि कै कुंजन मैं, कबहुँक बेनु बजावै।
कबहूँ अपनौ नाम लेइ कै, राधा राधा गावै॥ [2]
कबहूँ मौन गहि रहत ध्यान करि, मूँदि रहत दोउ नैन।
'हरीचंद' मोहन बिनु व्याकुल, नैकु नहीं चित चैन॥ [3]
- श्री भारतेंदु हरिशचंद्र, भारतेंदु ग्रंथावली

आज श्री राधा ने घनश्याम श्री कृष्ण का स्वरूप धारण कर लिया है। राधा नाम का त्याग कर, वे स्वयं को "गोविंद-गोविंद" कह रही हैं। [1]

श्री कृष्ण की ही भांति उनकी ग्रीवा झुकी हुई है, और वे कुंजों में वंशी का मधुर वादन कर रही हैं। कभी-कभी वे अपने ही नाम का उच्चारण कर "राधा-राधा" गा रही हैं। [2]

कभी वे मौन होकर दोनों आँखें मूँद लेती हैं और गहरे ध्यान में लीन हो जाती हैं।
श्री हरिचंद कहते हैं, "मनमोहन श्री कृष्ण के बिना, श्री राधा अत्यंत व्याकुल हैं और उनके चित्त में क्षणभर भी चैन नहीं है।" [3]