बखानत प्रेम प्रताप महातम - श्री नागरीदेव जी की वाणी, सिद्धांत के पद (28)

बखानत प्रेम प्रताप महातम - श्री नागरीदेव जी की वाणी, सिद्धांत के पद (28)

(सवैया)
बखानत प्रेम प्रताप महातम साँच न स्वाँग कसै कसि काँची। [1]
साधिक सिद्ध भयो तो कहा कुंवरि किशोरी कृपा नहिं जाँची॥ [2]
श्रीगुरु प्रेम प्रसन्न बिहारनिदासि श्रीनागरी के रंग राची। [3]
रे बुद्धि बिवेक बिचारि इहै जु कहै सु लहै तो करै सब साँची॥ [4]

- श्री नागरीदेव जी, श्री नागरीदेव जी की वाणी, सिद्धांत के पद (28)

श्री नागरीदेव जी कहते हैं — हे भाई! प्रेम को तुम प्रताप एवं माहात्म्य में मिलाकर वर्णन करते हो, इसलिए तुम्हारी रसिकता का स्वांग सच न होकर परखने पर कच्चाई ही निकलती है। [1]

यदि तुमने नित्य बिहारिनी जू (श्रीराधा) की कृपा को अनन्य भाव से जाँचा ही नहीं, तो साधक-सिद्ध कुछ भी हो जाओ, फिर भी स्वामिनी जू के निज रस-देश से वंचित ही रह जाओगे। [2]

हमारे प्राणनाथ गुरुदेव (श्री बिहारिनदेव) सदा अपने श्री गुरु के प्रेम से अनुप्राणित होकर, श्री किशोरी जू के प्रेम-रंग में ही रंगे रहते हैं। [3]

बुद्धि-विवेक द्वारा तुम भलीभाँति विचार करो और यह निश्चय कर लो कि जो गुरुदेव ने तुम्हें आज्ञा दी है, बस उसी पर तुम्हें चलना है — तब सब कुछ साँची ही साँची होता चला जाएगा, अर्थात् तुम वास्तविक सिद्ध बन जाओगे। [4]