ऐसें आरती करौ - श्री आनन्दघन जी, श्री घनानंद ग्रंथावली, पदावली (240)

ऐसें आरती करौ - श्री आनन्दघन जी, श्री घनानंद ग्रंथावली, पदावली (240)

(राग गंधार)
ऐसें आरती करौ।
सुथिर थार हिय बिसद बीच लै प्रेम-प्रदीप धरौ॥ [1]
उज्जल दसा सनेह-सँजोई जोति जगाइ ढरौ।
भाव-पुहुप प्रतीति सों संजुत बारनि ओर अरौ॥ [2]
मोहन-मुख जगमगनि पानि पै निरखत हरष भरौ।
आनँदघन उमाह आरति कौं हरिहि बढ़ाइ हरौ॥ [3]
- श्री आनन्दघन जी, श्री घनानंद ग्रंथावली, पदावली (240)

प्रभु की आरती करनी हो तो ऐसी करो, हृदय-रूपी स्थिर और विशाल थाल सजाकर, उसमें प्रेम-रूपी दीपक को प्रज्ज्वलित कर रख दो। [1]

स्नेह से युक्त, निर्मल ज्योति जगाकर, प्रभु के प्रति अपना मन और चित्त उन्मुख कर लो।विश्वास और भक्ति से भरकर भाव-रूपी सुमन उनके चरणों में अर्पित कर दो। [2]

फिर जब श्री कृष्ण के मुख की अलौकिक कान्ति तुम्हारे अंतर में जगमगा उठे, तो अपने हृदय को परमानन्द से परिपूर्ण कर लो। श्री आनन्दघन कहते हैं, उत्साह और श्रद्धा से की गई यह आरती प्रभु के हृदय को भी मोहित कर लेगी। [3]