(सवैया)
पहने यह कुण्डल योंही रहो, अलकावलि योंही सँवारे रहो। [1]
अधरामृत पान कराते हुए, मुरली कर-कञ्ज में धारे रहो॥ [2]
नहीं और विशेष करो कुछ तो, अनियारे दृगों से निहारे रहो। [3]
कहीं जाओ न मोहन छोड़ हमें, बने जीवनप्राण हमारे रहो॥ [4]
- ब्रज के सवैया
हे मनमोहन! अपने कानों में यह सुंदर कुण्डल सजाए रहो, और अपनी अलकावली को इसी प्रकार सँवारते रहो। [1]
अपने अधरों के अमृत का रसपान कराते हुए, मुरली को अपने करकमलों में यथावत थामे रहो। [2]
यदि और कुछ न भी करो, तो बस उन्हीं तिरछी चितवनों से मुझे निहारते रहो। [3]
हे मनमोहन, हमें छोड़कर कहीं और न जाना — सदा के लिए हमारे हृदय में, हमारे जीवन-प्राण बनकर ही निवास करो। [4]
पहने यह कुण्डल योंही रहो, अलकावलि योंही सँवारे रहो। [1]
अधरामृत पान कराते हुए, मुरली कर-कञ्ज में धारे रहो॥ [2]
नहीं और विशेष करो कुछ तो, अनियारे दृगों से निहारे रहो। [3]
कहीं जाओ न मोहन छोड़ हमें, बने जीवनप्राण हमारे रहो॥ [4]
- ब्रज के सवैया
हे मनमोहन! अपने कानों में यह सुंदर कुण्डल सजाए रहो, और अपनी अलकावली को इसी प्रकार सँवारते रहो। [1]
अपने अधरों के अमृत का रसपान कराते हुए, मुरली को अपने करकमलों में यथावत थामे रहो। [2]
यदि और कुछ न भी करो, तो बस उन्हीं तिरछी चितवनों से मुझे निहारते रहो। [3]
हे मनमोहन, हमें छोड़कर कहीं और न जाना — सदा के लिए हमारे हृदय में, हमारे जीवन-प्राण बनकर ही निवास करो। [4]

