रे मन क्यों चाटे जग धूर - श्री ललित लड़ैती, श्री किशोरी कृपा कटाक्ष, विनय (33)

रे मन क्यों चाटे जग धूर - श्री ललित लड़ैती, श्री किशोरी कृपा कटाक्ष, विनय (33)

(राग योगिया कालिंगड़ा)
रे मन क्यों चाटे जग धूर।
धन जोबन यों जाय हाथ तें, जा विधि उड़त कपूर॥ [1]
मात तात भ्राता सुत दारा, यह नाते सब कूर।
ललित लड़ैती बस वृन्दावन, ब्रजरज मिल ह्वै चूर॥ [2]

- श्री ललित लड़ैती, श्री किशोरी कृपा कटाक्ष, विनय (33)

हे मन! क्यों इस सांसारिक धूल को चाट रहा है । यह धन एवं यौवन तो कपूर की भाँति क्षणिक है । [1]

माता, पिता, भाई, पुत्र, पत्नी और अन्य सभी रिश्ते मात्र स्वार्थ के बंधन से भरे हुए हैं । श्री ललित लड़ैती कहते हैं, “यदि तू वास्तविक सुख की खोज में है, तो श्रीधाम वृंदावन में वास कर और उसकी पवित्र रज में स्वयं को विलीन कर।”।  [2]