हमारैं इनके वचन प्रमान - श्री किशोरी अलि

हमारैं इनके वचन प्रमान - श्री किशोरी अलि

हमारैं इनके वचन प्रमान।
श्री हरिवंश गुसाईं, श्री हरिदास किये जे गान॥ [1]
व्यास समान व्यास हैं मेरे, ध्रुव ध्रुवपद के वक्ता।
विट्ठलविपुल बिहारिनिदासी, रहसिकेलि अनुरक्ता॥ [2]
यही तत्व हिय धार छोड़ अब नाना मत व्यभिचारे।
गहि अनन्य मत सेइ 'किशोरी', निरखौ जुगल विहारे॥ [3]
- श्री किशोरी अलि

इन निम्नलिखित रसिकों के वचनों (वाणियों) को ही मैं प्रमाण मानता हूँ। गुसाईं श्री हित हरिवंश एवं स्वामी श्री हरिदास जी ने जिस रस का गान किया है वही रस मेरे जीवन का भी आधार है। [1]

श्री हरिराम व्यास जी वेदव्यास के समान हैं, श्री हित ध्रुवदास जी ध्रुवपद के वक्ता हैं। श्री विट्ठलविपुल देव जी एवं श्री बिहारिन देव जी नित्य केलिरस में अनुरक्त रहते हैं। [2]

श्री किशोरी अलि कहते हैं "हे मन, इन रसिकों ने जिस रस का बखान किया है, उसी रस को ह्रदय में धारण कर एवं नाना मतों में व्यभिचार करना छोड़ दे। अनन्य मत को स्वीकार कर श्री राधा चरणों की सेवा कर एवं युगल किशोर के नित्य विहार का अवलोकन कर।" [3]