पै मिठास या मार के रोम-रोम भरपूर - श्री रसखान, प्रेम वाटिका (30)

पै मिठास या मार के रोम-रोम भरपूर - श्री रसखान, प्रेम वाटिका (30)

पै मिठास या मार के, रोम-रोम भरपूर।
मरत जियै झुकतौ थिरै, बनै सु चकनाचूर॥

- श्री रसखान, प्रेम वाटिका (30)

प्रेम की चोट गहरी होते हुए भी मधुर होती है। इसकी चोट से मनुष्य का रोम-रोम माधुर्यपूर्ण रस से भरपूर हो जाता है। जो प्रेम में अपना बलिदान देता है वही अमरत्व को प्राप्त करता है। प्रेम में गिरता हुआ व्यक्ति ही वास्तव में संभलता है। जो अपने अहंकार को त्याग कर प्रेम की ओर अग्रसर होता है, उसी का जीवन सुधरता है।