अर्धोन्मीलितलोचनस्य पिबतो राधेति नामामृतम् प्रेमाश्रूणि विमुञ्चतः पुलकितां सर्वाँ तनुं बिभ्रतः ।
कुत्रापि स्खलतः क्वचिच्च पततो वृन्दाटवीवीथिषु स्वच्छन्दं व्रजतः कदातिसुखदा यास्यन्ति मे वासराः ॥
- श्री वागीश शास्त्री जी, श्रीराधासप्तशती (5.35)
अधखुली आँखों से देखता, ‘श्रीराधे! श्रीराधे!!’ इस नाम-अमृत का पान करता, नेत्रों से प्रेम के आँसू बहाता, सारे अंगों से पुलकित होता, कहीं लड़खड़ाता, कहीं गिरता और पड़ता हुआ मैं (देह की सुध-बुध खोकर) श्रीवृंदावन की गलियों में स्वच्छंद विचरूँ और इसी अवस्था में मेरे परम सुखदायक दिन व्यतीत हों—ऐसा शुभ समय कब आएगा?
कुत्रापि स्खलतः क्वचिच्च पततो वृन्दाटवीवीथिषु स्वच्छन्दं व्रजतः कदातिसुखदा यास्यन्ति मे वासराः ॥
- श्री वागीश शास्त्री जी, श्रीराधासप्तशती (5.35)
अधखुली आँखों से देखता, ‘श्रीराधे! श्रीराधे!!’ इस नाम-अमृत का पान करता, नेत्रों से प्रेम के आँसू बहाता, सारे अंगों से पुलकित होता, कहीं लड़खड़ाता, कहीं गिरता और पड़ता हुआ मैं (देह की सुध-बुध खोकर) श्रीवृंदावन की गलियों में स्वच्छंद विचरूँ और इसी अवस्था में मेरे परम सुखदायक दिन व्यतीत हों—ऐसा शुभ समय कब आएगा?

