अज बिष्णु, महेश, बृजेश, श्री - श्री प्रेम जी

अज बिष्णु, महेश, बृजेश, श्री - श्री प्रेम जी

(सवैया)
अज बिष्णु, महेश, बृजेश, श्री, नहिं पावत पार बड़े अधिकारी। [1]
जग जाल जाड़्यौ जब जीव जपै, करे सुक्ख प्रदत्त श्रीकुंजबिहारी॥ [2]
नित्य बिहार बिलीन छबीली लै, ध्यावत श्री हरिदास दुलारी। [3]
तिहारी अर्चना 'प्रेम' पुजारी करें, हिये माँहि बिठाकर बाँकेबिहारी॥ [4]

- श्री प्रेम जी

ब्रह्मा, विष्णु, महादेव, ब्रजेश्वर श्रीकृष्ण और स्वयं लक्ष्मीजी जैसे श्रेष्ठ अधिकारी भी श्री कुंजबिहारी एवं कुंजबिहारिणी की महिमा को पूर्णरूपेण नहीं जान सकते। [1]

जगत के मायाजाल में फँसा जीव यदि उनके नाम का सुमिरन करता है, तो श्री कुंजबिहारी उसे मायामुक्त कर अपार सुख प्रदान करते हैं। [2]

श्री कुंजबिहारी सदा अपनी प्राणप्रिय छबीली श्री कुंजबिहारिणी के संग नित्य विहार में लीन रहते हैं, जिनका ध्यान नित्य ही श्री हरिदास दुलारी करती रहती हैं। [3]

श्री प्रेम जी कहते हैं — “हे श्री बाँकेबिहारी! आपको अपने हृदय-मंदिर में विराजमान कर केवल प्रेमी रसिक भक्त ही आपकी सच्ची अर्चना कर पाते हैं।” [4]