नाचत दोउ रहस में रँग-भीनैं  - श्री भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसीकाभरण ग्रन्थ (11.1)

नाचत दोउ रहस में रँग-भीनैं - श्री भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसीकाभरण ग्रन्थ (11.1)

(राग केदारौ)
नाचत दोउ रहस में रँग-भीनैं ।
हाव-भाव उपजत अँग-अंगन, कोक-कला मन दीनैं॥ [1]
बाजत मधुर मृदंग किंकिनी, नूपुर ताल नबीनैं।
होड़ा-होड़ी तान, तिरप-गति लेत, नहीं कोउ हीनैं॥ [2]
राका-रति, रजनीकर-आनन उदित मदन बस कीनैं।
रीझि-रीझि भगवत की स्वामिनि, लाल अंक भरि लीनैं॥ [3]

- श्री भगवत रसिक जी, भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसीकाभरण ग्रन्थ (11.1)

अनंग-रंग में सराबोर श्रीयुगलकिशोर एकान्त में नाच रहे हैं | काम-केलि की नयी-नयी कलाओं में लगे हुए मन वाले उन दोनों के अंग-अंग से अनगिनत हाव-भाव उत्पन्न हो रहे हैं। [1]

नित्यविहार की मधुर मृदंग बज रही है, करधनी और पायजेब नई-नई तालें लगा रहे हैं। दोनों (प्रिया-लाल) प्रतिस्पर्धा-पूर्वक आलाप और तिरप (नृत्यताल) की गति ले रहे हैं - दोनों में कोई कम नहीं पड़ रहा है। [2]

उसी समय रजनी-रूपी रति के मुख-तुल्य पूर्ण चन्द्रमा ने उदित होकर उन्हें कामदेव के हवाले कर दिया और तभी भगवतरसिकजी की स्वामिनी ने रीझ कर लालजी को अपनी भुजाओं में समेट लिया। [3]