(राग दुर्गा त्रिताल)
कृपा करो अब नवल नवेली।
सेवाकुंज-निकुंज भवन की, लता फूल बनूं वेली॥ [1]
छकी रहौं रस माती नित ही, छोड़ो नांही अकेली।
श्रीगोपालहित हरि स्वामिनी, जैसे फूल चमेली॥ [2]
- श्री हित गोपाल दास [सेवा कुञ्ज वाले], निकुंज रस वल्लरी (34)
हे नवल-नवेली श्रीराधा! अब मुझ पर कृपा कीजिए, सेवाकुंज और निकुंज के भवन की मैं लता, फूल एवं बेली बन जाऊं। [1]
मैं सदा आपके रस में ही निमग्न रहूँ, कृपा मुझे कभी अकेली न छोड़ें। श्री हित गोपाल दास जी कहते हैं कि हे श्री हरि की स्वामिनी (श्रीराधा) आप चमेली के फूल के समान हो । [2]
कृपा करो अब नवल नवेली।
सेवाकुंज-निकुंज भवन की, लता फूल बनूं वेली॥ [1]
छकी रहौं रस माती नित ही, छोड़ो नांही अकेली।
श्रीगोपालहित हरि स्वामिनी, जैसे फूल चमेली॥ [2]
- श्री हित गोपाल दास [सेवा कुञ्ज वाले], निकुंज रस वल्लरी (34)
हे नवल-नवेली श्रीराधा! अब मुझ पर कृपा कीजिए, सेवाकुंज और निकुंज के भवन की मैं लता, फूल एवं बेली बन जाऊं। [1]
मैं सदा आपके रस में ही निमग्न रहूँ, कृपा मुझे कभी अकेली न छोड़ें। श्री हित गोपाल दास जी कहते हैं कि हे श्री हरि की स्वामिनी (श्रीराधा) आप चमेली के फूल के समान हो । [2]

![कृपा करो अब नवल नवेली - श्री हित गोपाल दास [सेवा कुञ्ज वाले], निकुंज रस वल्लरी (34)](https://images.brajrasik.org/6788f747eeec73000392dcd9-m.jpeg)