किं धर्मेण ममास्ति - श्रीगोवर्द्धन भट्ट, श्री राधाकुण्ड स्तव (42)

किं धर्मेण ममास्ति - श्रीगोवर्द्धन भट्ट, श्री राधाकुण्ड स्तव (42)

किं धर्मेण ममास्ति कृत्यमिह किं योगेन किं सद्गुणैः।
किं मे ब्रह्ममुखेन किं मुरारिपोर्ध्यानाधिनाप्यद्य च॥
श्रीवृन्दाविपिनेश्वरीसरसिकागर्वेण न क्वापि मे।
चित्तं कुण्डरसामृताम्बुद्धि भृतं सज्जीत्यतीवोन्मदम ॥

- श्रीगोवर्द्धन भट्ट, श्री राधाकुण्ड स्तव (42)

मेरे धर्म साधन में क्या रखा है। नित्यकृत्य भी अति तुच्छ है। योगादि साधना तथा सद्गुणों से मेरा क्या होगा? ब्रह्म सुख को भी मेरा हृदय नहीं चाहता है। अधिक तो अधिक मुरारी (श्री कृष्ण) के ध्यानादि से भी इष्ट सिद्धि नहीं हो सकती है। वृंदावनेश्वरी की सरसी (श्री राधा कुंड) के अभिमान में मग्न मेरा चित्त अनयत्र नहीं जा सकता है। चित्त तो अत्यंत उन्मत्त होकर कुंड के रसामृत-समुद्र का पान कर रहा है।