(कवित्त)
मुनिन के वृंदन के वृंद सदां वंदें तुम्हें,
आनंद के कन्दै नन्दनन्दै सँग लीजिये। [1]
तीन लोक जीवन के सोकन की हारनी,
प्रसन्न मुख पंकज सौं चरन सरन दीजिये॥ [2]
निकुंज भू विलासिनी प्रकासनी हौ ग्यान की,
विजेन्द्र भान नंदनी अरज सुनि लीजिये। [3]
कहत बार बार मैं तिहारे दरबार में,
‘सुलाल बलबीर’ पै कृपा कटाक्ष कीजिये॥ [4]
- श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद, श्री राधा शतक (18)
समस्त मुनिगण आपके चरणों की वंदना करते हैं । आप आनंद कंद, ब्रजराज श्री कृष्ण की चिरसंगिनी हैं । [1]
आप तीनों लोकों का शोक दूर करने वाली हैं, आप प्रसन्नचित्त प्रफुल्लित मुख कमल वाली हैं। कृपा कर मुझे अपने चरणों की शरण दीजिए । [2]
आप निकुंज में विलास करने वाली हैं, ज्ञान का प्रकाश करने वाली राजा वृषभानु की राजकुमारी बेटी हैं । कृपा कर मेरी प्रार्थना को सुन लीजिए । [3]
श्री लाल बलबीर कहते हैं कि मैं आपके दरबार में बार-बार यही प्रार्थना करता हूँ कि आप मुझे अपनी कृपा दृष्टि से कृतार्थ करें । [4]
मुनिन के वृंदन के वृंद सदां वंदें तुम्हें,
आनंद के कन्दै नन्दनन्दै सँग लीजिये। [1]
तीन लोक जीवन के सोकन की हारनी,
प्रसन्न मुख पंकज सौं चरन सरन दीजिये॥ [2]
निकुंज भू विलासिनी प्रकासनी हौ ग्यान की,
विजेन्द्र भान नंदनी अरज सुनि लीजिये। [3]
कहत बार बार मैं तिहारे दरबार में,
‘सुलाल बलबीर’ पै कृपा कटाक्ष कीजिये॥ [4]
- श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद, श्री राधा शतक (18)
समस्त मुनिगण आपके चरणों की वंदना करते हैं । आप आनंद कंद, ब्रजराज श्री कृष्ण की चिरसंगिनी हैं । [1]
आप तीनों लोकों का शोक दूर करने वाली हैं, आप प्रसन्नचित्त प्रफुल्लित मुख कमल वाली हैं। कृपा कर मुझे अपने चरणों की शरण दीजिए । [2]
आप निकुंज में विलास करने वाली हैं, ज्ञान का प्रकाश करने वाली राजा वृषभानु की राजकुमारी बेटी हैं । कृपा कर मेरी प्रार्थना को सुन लीजिए । [3]
श्री लाल बलबीर कहते हैं कि मैं आपके दरबार में बार-बार यही प्रार्थना करता हूँ कि आप मुझे अपनी कृपा दृष्टि से कृतार्थ करें । [4]

