तेरे तन की उपमा कौं देख्यौ - श्री कुंभनदास, श्री कुम्भनदास जी की वाणी (168)

तेरे तन की उपमा कौं देख्यौ - श्री कुंभनदास, श्री कुम्भनदास जी की वाणी (168)

(राग विलावल)
तेरे तन की उपमा कौं देख्यौ
मैं विचारि के कौउ नाहिन भामिनि। [1]
कहा बापुरो कंचन, कदली, कहा केहरि, गज,
कपोत, कुंभ, पिक कहा चंद्रमा कहा वापुरि दामिनि? ॥ [2]
कहा कुरंग, सुक, बंधूक, केकी, कमल या आगें
श्री देखिये सब की नि:कामिनि॥ [3]
मोहन रसिक गिरि-धरण कहत ‘राधे’!
परम भावंती तू है ‘कुंभनदास’ स्वामिनि॥ [4]

- श्री कुंभनदास, श्री कुम्भनदास जी की वाणी (168)

श्रीकृष्ण श्रीराधा से कहते हैं:
हे भामिनी!, मैं बार बार विचार करता हूँ, परंतु आपके स्वरूप की तुलना के लिए कुछ भी उपयुक्त नहीं पाता । [1]


न तो सोना, न केले का वृक्ष, न शेर, न हाथी, न कपोत, न कलश, न कोयल, न चंद्रमा, और न ही दामिनी आपके तन की शोभा की बराबरी कर सकते हैं। [2]


मृग, तोता, बंधुका पुष्प, मोर, या कमल—इनसे आपकी दिव्य शोभा की तुलना कैसे हो सकती है? ये तो आपके सम्मुख नगण्य प्रतीत होते हैं। [3]


रसिक मनमोहन, गिरिराजधरण, श्रीकृष्ण चंद्रकहते हैं: “हे कुंभनदास की स्वामिनी राधे! आप मुझे परम भावंती (प्रिय) हैं।” [4]