स्वर्ग में कहाँ है मधुर ध्वनि राधे राधे की - श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती ‘हरे कृष्ण’, वृन्दावन शतक (12)

स्वर्ग में कहाँ है मधुर ध्वनि राधे राधे की - श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती ‘हरे कृष्ण’, वृन्दावन शतक (12)

(कवित्त)
स्वर्ग में कहाँ है मधुर ध्वनि राधे राधे की,
स्वर्ग में कहाँ कलित कुंज अभिराम है। [1]
स्वर्ग में कहाँ भीर गोपी गाय ग्वाल वालों की,
स्वर्ग में कहाँ पुलिन यमुना ललाम है॥ [2]
स्वर्ग में सरस ब्रजभाषा का प्रचार कहाँ,
स्वर्ग में कहाँ माखन चोर घनश्याम है। [3]
स्वर्ग में अमित सुख इतना अपार कहाँ,
स्वर्ग से भी श्रेष्ठ यह वृन्दावन धाम है॥ [4]

- डंडी स्वामी श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती ‘हरे कृष्ण’, वृन्दावन शतक (12)

स्वर्ग में कहाँ “राधे राधे” की मधुर धुन सुनाई देती है?
स्वर्ग में कहाँ हैं वे मनमोहक कुंज एवं वन? [1]

स्वर्ग में कहाँ गोपियों, गायों और ग्वालों की भीड़ दिखती पड़ती है ?
स्वर्ग में कहाँ हैं यमुना के ऐसे सुंदर तट? [2]

स्वर्ग में कहाँ बोली जाती है ऐसी सरस अमृतमयी ब्रजभाषा?
स्वर्ग में कहाँ है वह माखनचोर (घनश्याम) श्रीकृष्ण? [3]

स्वर्ग में कहाँ मिलता है ऐसा अनंत और अनुपम रस?
डंडी स्वामी श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती कहते हैं कि यह वृंदावन धाम तो स्वर्ग से भी अत्यधिक श्रेष्ठ है। [4]