उद्धव आदि ब्रह्मादिक दुर्लभ - श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धांत के कवित्त-सवैया (61)

उद्धव आदि ब्रह्मादिक दुर्लभ - श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धांत के कवित्त-सवैया (61)

(सवैया)
उद्धव आदि ब्रह्मादिक दुर्लभ, परी प्रमान जुही सुक भाखी।
जाकौ सुजस बखाँनत श्रीमुख, स्याँमा स्याँम सहसमुख साखी॥ [1]
श्री बिहारीदास विस्वास तिहीं बल, उमंडि मैंड मरजादा नाँखी।
रह्यौं न मन भै भ्रम क्रम श्रम कछु, ब्रज रज काज कियो रज राखी॥ [2]

- श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धांत के कवित्त-सवैया (61)

श्री ब्रज की रज का प्रभाव अत्यंत अलौकिक और विलक्षण है। इसका गुणगान स्वयं श्री शुकदेव परमहंस जी ने करते हुए कहा कि यह रज उद्धव, ब्रह्मा और अन्य देवों के लिए भी दुर्लभ है। स्वयं श्रीराधा-कृष्ण ने अपने श्रीमुख से इस रज की महानता को स्वीकार किया है, और उसकी साक्षी स्वयं श्री शेषनाग ने दी है। [1]

हमने इस रजरानी के बल पर, अत्यंत उल्लासपूर्वक, समस्त सांसारिक मर्यादाओं को त्यागकर, अपने मन के समस्त भय, भ्रम, श्रम, क्रम आदि दूर कर दिए हैं और इस रजरानी ने हमारी समस्त अभिलाषाओं को सफल कर दिया है। इसीलिए हम सतत इस ब्रज रज को अपने माथे पर धारण करके रखते हैं। [2]