मूरत नैंनन में रमै, हिय मथि गुन रहै पूरि।
दशा न कोऊ समझि है, प्रेम पहुचनौ दूरि॥
- श्री नेह नागरीदास, श्री नेह नागरीदास जी की वाणी, दोहावली (23)
प्रियतम का स्वरूप नेत्रों में सदा बसा रहता है, और हृदय उसके गुणों से भरा रहता है। ऐसे प्रेमी की अवस्था को बाहरी दृष्टि से कोई समझ नहीं जा सकता, प्रेम की गहराई समझ से बहुत परे होती है ।
दशा न कोऊ समझि है, प्रेम पहुचनौ दूरि॥
- श्री नेह नागरीदास, श्री नेह नागरीदास जी की वाणी, दोहावली (23)
प्रियतम का स्वरूप नेत्रों में सदा बसा रहता है, और हृदय उसके गुणों से भरा रहता है। ऐसे प्रेमी की अवस्था को बाहरी दृष्टि से कोई समझ नहीं जा सकता, प्रेम की गहराई समझ से बहुत परे होती है ।

