(राग ईमन)
प्रीतम के प्रान प्यारी, प्यारी जी के प्रान पिय।
प्रेम रासि एक रस, दोऊ छवि देखहीं॥
तृपित न होत क्यौं हूँ, बढ़त अधिक रुचि,
छिन-छिन चौंप नई लागै नैन न निमेषहीं॥ [1]
रीझि-रीझि रंग-भरे उमगि लोइन ढरे,
अंक-अंक रहे भरि विवस विसेषहीं॥
‘हित ध्रुव’ यह गति हेरि कैं मगन भईं,
सखी सब ऐसैं रही मानौ चित्र रेख हीं॥ [2]
- श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, पद्यावली (37)
श्री राधा श्री कृष्ण के प्राण हैं और श्री राधा के प्राण हैं श्री कृष्ण। ऐसे प्रेम-राशि युगल परस्पर एक दूसरे की छवि का निरंतर अवलोकन करते रहते हैं, तथापि किसी भी प्रकार तृप्त नहीं होते, वरन् उनकी रुचि अधिकाधिक बढ़ती ही जाती है। [1]
प्रति क्षण रूप-दर्शन की नई-नई उमंगें उठने के कारण युगल की नेत्र-पलकें लगती ही नहीं। उनके आनंदपूर्ण नेत्र रीझ-रीझ कर प्रेमनीर ढलकाते रहते हैं। वे रस-विवश हुए परस्पर एक दूसरे को अद्भुत अंक में भरते रहते हैं। श्री हित ध्रुवदास जी कहते हैं कि युगल की ऐसी प्रेम-विवश स्थिति का अवलोकन कर रस-मग्न हुईं सब सखियाँ ऐसे स्तब्ध रह जाती हैं, मानो चित्र की रेखाएँ हों। [2]
प्रीतम के प्रान प्यारी, प्यारी जी के प्रान पिय।
प्रेम रासि एक रस, दोऊ छवि देखहीं॥
तृपित न होत क्यौं हूँ, बढ़त अधिक रुचि,
छिन-छिन चौंप नई लागै नैन न निमेषहीं॥ [1]
रीझि-रीझि रंग-भरे उमगि लोइन ढरे,
अंक-अंक रहे भरि विवस विसेषहीं॥
‘हित ध्रुव’ यह गति हेरि कैं मगन भईं,
सखी सब ऐसैं रही मानौ चित्र रेख हीं॥ [2]
- श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, पद्यावली (37)
श्री राधा श्री कृष्ण के प्राण हैं और श्री राधा के प्राण हैं श्री कृष्ण। ऐसे प्रेम-राशि युगल परस्पर एक दूसरे की छवि का निरंतर अवलोकन करते रहते हैं, तथापि किसी भी प्रकार तृप्त नहीं होते, वरन् उनकी रुचि अधिकाधिक बढ़ती ही जाती है। [1]
प्रति क्षण रूप-दर्शन की नई-नई उमंगें उठने के कारण युगल की नेत्र-पलकें लगती ही नहीं। उनके आनंदपूर्ण नेत्र रीझ-रीझ कर प्रेमनीर ढलकाते रहते हैं। वे रस-विवश हुए परस्पर एक दूसरे को अद्भुत अंक में भरते रहते हैं। श्री हित ध्रुवदास जी कहते हैं कि युगल की ऐसी प्रेम-विवश स्थिति का अवलोकन कर रस-मग्न हुईं सब सखियाँ ऐसे स्तब्ध रह जाती हैं, मानो चित्र की रेखाएँ हों। [2]

