ब्रज के परम सनेही लोग ।
गारी दैं हँंसि मिलत गहबरे, अंतर प्रेम संयोग॥ [1]
प्रेम रूप रस दंपति लीला, यह तिनकौ नित भोग ।
‘नागरीदास’ सदा आनंदी, सुपनें हूँ नहिं सोक ॥ [2]
- श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह), श्री नागरीदास जी की वाणी, छूटक पद (2)
ब्रजवासी अत्यंत स्नेही और सरल हृदय लोग हैं। वे प्रेमपूर्वक गाली देते हैं, और हँसते हुए मिलते हैं। उनका हृदय स्नेह से परिपूर्ण हैं। [1]
दिव्य दंपति श्री राधा-कृष्ण की प्रेम और सौंदर्य से परिपूर्ण रस लीलाएँ ही उनका नित्य भोग हैं। श्री नागरीदास कहते हैं, “ये ब्रजवासी सदा आनंद में मग्न रहते हैं, और स्वप्न में भी शोक उन्हें स्पर्श नहीं करता।” [2]
गारी दैं हँंसि मिलत गहबरे, अंतर प्रेम संयोग॥ [1]
प्रेम रूप रस दंपति लीला, यह तिनकौ नित भोग ।
‘नागरीदास’ सदा आनंदी, सुपनें हूँ नहिं सोक ॥ [2]
- श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह), श्री नागरीदास जी की वाणी, छूटक पद (2)
ब्रजवासी अत्यंत स्नेही और सरल हृदय लोग हैं। वे प्रेमपूर्वक गाली देते हैं, और हँसते हुए मिलते हैं। उनका हृदय स्नेह से परिपूर्ण हैं। [1]
दिव्य दंपति श्री राधा-कृष्ण की प्रेम और सौंदर्य से परिपूर्ण रस लीलाएँ ही उनका नित्य भोग हैं। श्री नागरीदास कहते हैं, “ये ब्रजवासी सदा आनंद में मग्न रहते हैं, और स्वप्न में भी शोक उन्हें स्पर्श नहीं करता।” [2]

