प्रेम कटारी हँसि हँसि मारी, मोहन मीत हमारे। [1]
भीतर बाहर तन मन छेदो, निकसी पैले पारे॥ [2]
घायल परी कसक जिय माँहि, दर्शन औषद दीजै। [3]
‘सखिछोना’ व्याकुल भरे आँसू, तुम बिन नहिं पतीजै॥ [4]
- श्री गुरु छौनाजी महाराज, विरह की मांझ (3)
मेरे मनमीत मोहन (श्रीकृष्ण) ने हँस-हँसकर प्रेम का खंजर चलाकर मुझे घायल कर दिया है। [1]
अंदर और बाहर, मेरा तन और मन दोनों घायल हो चुके हैं, क्योंकि खंजर ने दूसरी ओर तक भेद दिया है। [2]
मैं तो घायल होकर पड़ी हूँ, मेरे हृदय में उठता यह दर्द केवल श्रीकृष्ण के दर्शन रूपी औषधि से ही शांत हो सकता है। [3]
श्री गुरुछौना जी कहते हैं, “अब मैं व्याकुल होकर आँसू बहा रहा हूँ, क्योंकि बिना मोहन के मेरा हृदय कहीं भी चैन नहीं पा रहा है।” [4]
भीतर बाहर तन मन छेदो, निकसी पैले पारे॥ [2]
घायल परी कसक जिय माँहि, दर्शन औषद दीजै। [3]
‘सखिछोना’ व्याकुल भरे आँसू, तुम बिन नहिं पतीजै॥ [4]
- श्री गुरु छौनाजी महाराज, विरह की मांझ (3)
मेरे मनमीत मोहन (श्रीकृष्ण) ने हँस-हँसकर प्रेम का खंजर चलाकर मुझे घायल कर दिया है। [1]
अंदर और बाहर, मेरा तन और मन दोनों घायल हो चुके हैं, क्योंकि खंजर ने दूसरी ओर तक भेद दिया है। [2]
मैं तो घायल होकर पड़ी हूँ, मेरे हृदय में उठता यह दर्द केवल श्रीकृष्ण के दर्शन रूपी औषधि से ही शांत हो सकता है। [3]
श्री गुरुछौना जी कहते हैं, “अब मैं व्याकुल होकर आँसू बहा रहा हूँ, क्योंकि बिना मोहन के मेरा हृदय कहीं भी चैन नहीं पा रहा है।” [4]

