मुदित लाल प्यारी चरण चित्र करे।
नील कमल कर पीत पद पदम, चार जलज दृग नेह भरे॥ [1]
कौमल पिय परसत नाजुक प्रिया, उर अंतर अनुराग ढरे।
मोर पीछ भरि सुरंग तूलिका, सहजहि छाप विचित्र धरे॥ [2]
परम सुखी या अवसर पाऐं, चरन संवारि नाहु मन हरे।
कृष्ण चंद्र राधा चरण दासि छबि, सुखद केलि रचि चित्त अरे॥[3]
- श्री हित कृष्ण चंद्र
आनंद में मग्न होकर प्रियतम श्री कृष्ण, प्यारीजू श्री राधा के चरणों का चित्रांकन कर रहे हैं।नील कमल के समान सुंदर हाथों से, वे स्वर्ण कमल सदृश श्री राधा के चरणों को सजा रहे हैं, और चित्रित करते-करते उनके नेत्र प्रेम से सराबोर हो उठते हैं। [1]
कोमल प्रियतम जब श्री प्रिया जी के कोमल चरणों का स्पर्श करते हैं, तब उनके हृदय में प्रेम का अपार उच्छलन होता है।मोरपंख रूपी तूलिका को लाल रंग में डुबोकर, वे सहज ही अनुपम एवं अद्भुत छवियाँ बनाते हैं। [2]
इस दुर्लभ अवसर को प्राप्त कर वे परम आनंद से भर उठते हैं, और प्रिया जू के चरणों को संवारते हुए भी उनका मन तृप्त नहीं होता। श्री कृष्ण चंद्र, श्री राधा चरण दासी, दिव्य प्रेम रूपी केली लीलाओं में पूर्ण रूप से निमग्न रहते हैं। [3]
नील कमल कर पीत पद पदम, चार जलज दृग नेह भरे॥ [1]
कौमल पिय परसत नाजुक प्रिया, उर अंतर अनुराग ढरे।
मोर पीछ भरि सुरंग तूलिका, सहजहि छाप विचित्र धरे॥ [2]
परम सुखी या अवसर पाऐं, चरन संवारि नाहु मन हरे।
कृष्ण चंद्र राधा चरण दासि छबि, सुखद केलि रचि चित्त अरे॥[3]
- श्री हित कृष्ण चंद्र
आनंद में मग्न होकर प्रियतम श्री कृष्ण, प्यारीजू श्री राधा के चरणों का चित्रांकन कर रहे हैं।नील कमल के समान सुंदर हाथों से, वे स्वर्ण कमल सदृश श्री राधा के चरणों को सजा रहे हैं, और चित्रित करते-करते उनके नेत्र प्रेम से सराबोर हो उठते हैं। [1]
कोमल प्रियतम जब श्री प्रिया जी के कोमल चरणों का स्पर्श करते हैं, तब उनके हृदय में प्रेम का अपार उच्छलन होता है।मोरपंख रूपी तूलिका को लाल रंग में डुबोकर, वे सहज ही अनुपम एवं अद्भुत छवियाँ बनाते हैं। [2]
इस दुर्लभ अवसर को प्राप्त कर वे परम आनंद से भर उठते हैं, और प्रिया जू के चरणों को संवारते हुए भी उनका मन तृप्त नहीं होता। श्री कृष्ण चंद्र, श्री राधा चरण दासी, दिव्य प्रेम रूपी केली लीलाओं में पूर्ण रूप से निमग्न रहते हैं। [3]

