यस्याः क्रीडां चन्द्रमा देवपत्न्यो दृष्ट्वा नग्ना आत्मनो न स्मरन्ति ।
वृन्दारण्ये स्थावरा जङ्गमाश्च भावाविष्टां राधिका तां नमामः ॥
- अथर्ववेद, श्रीराधिका तापनीयोपनिषत् (8)
जिनकी दिव्य क्रीड़ा को देखकर चंद्रमा और देवांगनाएँ इतनी मोहित हो जाती हैं कि वे अपने शरीर की भी सुध-बुध खो बैठती हैं। श्रीधाम वृंदावन में जब वे केलि-विहार करती हैं, तो उसका दर्शन कर जड़ वस्तुएँ चलने लगती हैं और चेतन भावावेश में जड़ हो जाती हैं। मैं उन श्रीराधिका को नमन करता हूँ।
वृन्दारण्ये स्थावरा जङ्गमाश्च भावाविष्टां राधिका तां नमामः ॥
- अथर्ववेद, श्रीराधिका तापनीयोपनिषत् (8)
जिनकी दिव्य क्रीड़ा को देखकर चंद्रमा और देवांगनाएँ इतनी मोहित हो जाती हैं कि वे अपने शरीर की भी सुध-बुध खो बैठती हैं। श्रीधाम वृंदावन में जब वे केलि-विहार करती हैं, तो उसका दर्शन कर जड़ वस्तुएँ चलने लगती हैं और चेतन भावावेश में जड़ हो जाती हैं। मैं उन श्रीराधिका को नमन करता हूँ।

