रोम-रोमनि अरुझि विलसत कामिनी।
तन में तन, मन में मन बसि रहे, रस बाढ्यौ सुख जामिनी॥ [1]
गावत सब सुर तार मिलीं रस, विहँसत हँसत प्रकास स्वामिनी।
श्रीललितमोहिनी यह छवि जोहनी, खेलौ हँसौ सुखधाम धामिनी॥ [2]
- श्री ललितमोहिनी देव, श्री ललितमोहिनी देव जू की वाणी, रस के पद (49)
दिव्य प्रेम रूपी कामनाओं से भरे दोनों (प्रिय-प्रियतम) इस प्रकार रस-विलास कर रहे हैं कि एक की रोमराजि दूसरे की रोमावली में उलझी हुई है। अँग-अँग में समाया हुआ है, मन मन में बस गया है। सुखमय यामिनी (रात्रि) में रस की बाढ़ आ रही है। [1]
स्वामिनी (श्रीकिशोरिजू) जब हँसती हैं तो (उनके श्रीमुख का) सौंदर्य खिल-खिलाने लगता है। सब सखियाँ सुर-ताल मिलाकर इस रस को गा रही हैं। इस छवि को सदा निहारने वाली श्रीललितमोहिनीजी कहती हैं कि हे सुखधाम श्रीप्रिया-प्रियतम, तुम दोनों निरंतर इसी प्रकार हँसते-खेलते रहो। [2]
तन में तन, मन में मन बसि रहे, रस बाढ्यौ सुख जामिनी॥ [1]
गावत सब सुर तार मिलीं रस, विहँसत हँसत प्रकास स्वामिनी।
श्रीललितमोहिनी यह छवि जोहनी, खेलौ हँसौ सुखधाम धामिनी॥ [2]
- श्री ललितमोहिनी देव, श्री ललितमोहिनी देव जू की वाणी, रस के पद (49)
दिव्य प्रेम रूपी कामनाओं से भरे दोनों (प्रिय-प्रियतम) इस प्रकार रस-विलास कर रहे हैं कि एक की रोमराजि दूसरे की रोमावली में उलझी हुई है। अँग-अँग में समाया हुआ है, मन मन में बस गया है। सुखमय यामिनी (रात्रि) में रस की बाढ़ आ रही है। [1]
स्वामिनी (श्रीकिशोरिजू) जब हँसती हैं तो (उनके श्रीमुख का) सौंदर्य खिल-खिलाने लगता है। सब सखियाँ सुर-ताल मिलाकर इस रस को गा रही हैं। इस छवि को सदा निहारने वाली श्रीललितमोहिनीजी कहती हैं कि हे सुखधाम श्रीप्रिया-प्रियतम, तुम दोनों निरंतर इसी प्रकार हँसते-खेलते रहो। [2]

