मैं तो गोवर्धन को जाऊँ मेरी वीर - श्री चन्द्रसखी जी

मैं तो गोवर्धन को जाऊँ मेरी वीर - श्री चन्द्रसखी जी

मैं तो गोवर्धन को जाऊँ मेरी वीर, नाय माने मेरो मनुआ।
नाय माने मेरो मनुआ, नाय माने कारो कनुआ॥
सात सेरकी करूँ कढ़ैया।
मैं तो संतन न्योत जिमाऊँ मेरे वीर, नाय माने मेरो मनुआ॥ [1]

सात कोस की दे परिक्रमा।
मैं तो मानसी गंगा नहाऊँ मेरे वीर, नाय माने मेरो मनुआ॥ [2]

कुण्ड कुण्ड को अचमन करको।
ब्रजरज शीष चढ़ाऊँ मेरे वीर, नाय माने मेरो मनुआ॥ [3]

चक्रलेश्वर को दर्शन करको।
जीवन सफल बनाऊँ मेरे वीर, नाय माने मेरो मनुआ॥ [4]

चन्द्रसखी भज बाल कृष्ण छवि।
बार बार बलि जाऊँ मेरे वीर, नाय माने मेरो मनुआ॥ [5]

- श्री चंद्र सखी जी (ब्रज के लोक गीत)

हे सखी, मैं गोवर्धन जाऊँगी, क्योंकि मेरा चंचल हृदय और कहीं शांति नहीं पाता।
मैं प्रेमपूर्वक प्रचुर मात्रा में भोजन बनाकर भोग लगाऊँगी, संतों को आमंत्रित कर उन्हें प्रेम से पवाऊँगी, क्योंकि इसके बिना मेरा हृदय मानता नहीं। [1]

मैं गोवर्धन की सप्तकोसी परिक्रमा करूँगी और मानसी गंगा के निर्मल जल में स्नान करूँगी, क्योंकि इसके बिना मेरा हृदय संतोष नहीं पाता। [2]

मैं कुंड-कुंड का जल ग्रहण करूँगी और ब्रज की दिव्य रज को अपने मस्तक पर धारण करूँगी, क्योंकि इसके बिना मेरा हृदय तृप्त नहीं होता। [3]

मैं चकलेश्वर महादेव के दर्शन कर अपने जीवन को सफल बनाऊँगी, क्योंकि इसके बिना मेरा हृदय संतोष नहीं पाता। [4]

श्री चंद्र सखी जी कहती हैं, “अपने गुरु श्री हित बलकृष्ण जी की कृपा से, मैं बार-बार गोवर्धन पर न्योछावर हो जाऊँगी, क्योंकि मेरा हृदय इसके बिना शांति नहीं पाता।” [5]