कुंजबिहारी कौ बसन्त सखि - श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (99)

कुंजबिहारी कौ बसन्त सखि - श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (99)

(राग गौड़)
कुंजबिहारी कौ बसन्त सखि,
चलहू न देखन जाँहिं ।
नव बन नव निकुंज नव पल्लव,
नव जुवतिन मिलि माँहिं  ॥ [1]
बंसी सरस मधुर धुनि सुनियत,
फूली अंग न माँहिं ।
सुनि श्रीहरिदास प्रेम सौं प्रेमहिं,
छिरकत छैल छुबाँहिं ॥ [2]

- श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (99)

अरी सखी ! चलो न, श्यामा- कुञ्जविहारी का वसन्तोत्सव देखने चलें । देखो, श्रीधाम वृन्दावन नव-नव उमंगों से पुलकित हो रहा है । इसकी कुंज निकुजें भी नवीन हैं और पत्र-पुष्पों का विकास भी नवीन है । ऐसे सरस वातावरण में श्यामा श्याम नव तरुणियों के बीच उनसे मिलकर वसन्तोत्सव मना रहे हैं । [1]

उनकी वंशी की सरस-मधुर ध्वनि को सुनकर प्रिया जी के हृदय में जो आनंन्द का सागर उमड़ पड़ा है, वह उनके श्री अंगों में सिमट नहीं पा रहा है । इस मधुमय दृश्य का अवलोकन करती श्रीहरिदासी जी कह रही हैं कि आनन्दातिरेक में झूमते-इठलाते प्रिया-प्रियतम जब परस्पर एक-दूसरे का स्पर्श करते हैं, तो ऐसा प्रतीत होता है, मानो प्रेम की दो मूर्तियाँ एक-दूसरे का प्रेम से अभिषेक कर रही हैं । [2]