संत जन बारह मास बसंत - जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज, प्रेम रस मदिरा, सिद्धांत माधुरी (103)

संत जन बारह मास बसंत - जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज, प्रेम रस मदिरा, सिद्धांत माधुरी (103)

संत जन बारह मास बसंत ।
पिउ पिउ कहि कहि छिन छिन निशिदिन, कूकत कोकिल संत ॥ [1]
कबहुँक झरत दृगन अँसुवन जनु, झर तरु – पत्र अनंत ।
कबहुँक झूमि झूमि मधुकर जनु, गुनगुनात गुन कंत ॥ [2]
कबहुँ प्रमत फूल सरसोँ जनु, फूलि फूलि हरषंत ।
प्रेम बसंत ‘कृपालु’ नित्य रह, रस सरसंत न अंत ॥ [3]

- जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज, प्रेम रस मदिरा, सिद्धांत माधुरी (103)

संत महात्माओं के पास बारहों महीने बसन्त का निवास रहता है । संत लोग बसन्तकालीन कोयल की कूक के समान अत्यन्त प्रेम भरी ध्वनि में निरन्तर ‘पिउ’ ‘पिउ’ ऐसा कहा करते हैं । [1]

संत लोग बसन्तकालीन पतझड़ के समान आँखों से निरन्तर प्रेमाश्रु गिराते रहते हैं । संत लोग बसन्तकालीन भौरों के समान गुनगुनाते हुए झूम – झूम कर श्यामा श्याम के गुण गाते रहते हैं । [2]

संत लोग बसन्तकालीन फूली हुई सरसों के समान प्रियतम के प्रेम में प्रमत होकर आनन्दातिरेक से हृदय में फूले नहीं समाते । श्री कृपालु जी कहते हैं बसन्त काल तो दो महीने का ही होता है, किन्तु संतों का प्रेम बसन्त तो नित्य रहता है, एवं प्रतिक्षण – वर्द्धमान  रस अनन्तकाल तक प्रदान करता है। [3]