हरि रस माते जे रहैं, तिन को मतो अगाध।
त्रिभुवन की संपति ‘दया’, तिन सम जानत साध॥
- श्री दयाबाई (शुक संप्रदाय के श्री चरण दास जी की शिष्या)
जो श्री हरि के रस में रंगे होते हैं उनकी अवस्था वर्णन से परे होती है । उनके लिए सम्पूर्ण त्रिलोकी की संपदा तिनके के समान तुच्छ होती है ।
त्रिभुवन की संपति ‘दया’, तिन सम जानत साध॥
- श्री दयाबाई (शुक संप्रदाय के श्री चरण दास जी की शिष्या)
जो श्री हरि के रस में रंगे होते हैं उनकी अवस्था वर्णन से परे होती है । उनके लिए सम्पूर्ण त्रिलोकी की संपदा तिनके के समान तुच्छ होती है ।

