जो मोसों मोसी करौ नाहीं कछु मोहि ठौर - श्री माधुरी दास, उत्कंठा माधुरी (76)

जो मोसों मोसी करौ नाहीं कछु मोहि ठौर - श्री माधुरी दास, उत्कंठा माधुरी (76)

जो मोसों मोसी करौ, नाहीं कछु मोहि ठौर ।
तुम हो तैसी कीजिए, अहो रसिक सिर मौर॥

- श्री माधुरी दास, उत्कंठा माधुरी (76)

यदि आप मेरे साथ वैसा ही व्यवहार करें जैसा मेरे कर्मों के अनुसार होना चाहिए, तो हे प्रभु, मैं इतना बड़ा पापी हूँ कि मेरा उद्धार कभी संभव नहीं होगा। आपके अतिरिक्त अब मेरा कोई दूसरा आश्रय नहीं है। आप तो परम कृपालु हैं, पतितों को भी अपने हृदय से लगाने वाले हैं। कृपा करके, हे रसिक सिरमौर, अपने उसी स्वभाव वश मुझ दीन पर भी अपनी कृपा बरसाइए।