(दोहा)
नव किशोर नव नागरी, नव सब सौंजरू साज।
नव वृन्दावन नव कुसुम, नव बसंत रितुराज॥
(पद) [इकताल, राग-वसंत]
नवल बसंत नवल श्रीवृन्दावन, नवलहि फूले फूल।
नवलहि कान्ह नवल सब गोपी, निरतत एकै तूल॥ [1]
नवलहि साषि जवादि कुंकुमा, नवलहि बसन अमूल।
नवलहि छींट बनी केसर की, मेंटत मनमथ सूल॥ [2]
नवल गुलाल उड़ै रंग बूका, नवल पवन कै झूल।
नवलहि बाजे बाजत श्रीभट्ट, कालिन्दी के कूल॥ [3]
- श्री भट्ट देवाचार्य, युगल शतक (84)
(दोहा)
श्रीवृन्दाबिपिन में सर्वत्र वसन्त की शोभा छायी हुई है। इसमें विहार-परायण श्रीराधा-कृष्ण की जोड़ी नवल है। उनके समीपस्थ सारी साज-सज्जा भी नवल है। श्रीधाम वृन्दावन भी नवल है, नवल कुसुमावलि फूली हुई है तथा ऋतुराज वसन्त भी तो नवल ही है।
(पद)
नवल ऋतुराज वसन्त के आगमन पर श्री धाम वृंदावन नवल प्रतीत हो रहा है एवं समस्त कुसुमावलि नवीन रूप से फूली हुई है । कान्हा भी नवल हैं तथा समस्त गोपियाँ भी नवल हैं । उनके मध्य श्रीवृषभानुनन्दिनी तथा नित्य नव-किशोर श्रीलालजी नृत्य कर रहे हैं। [1]
जवादि की नवीन शाखाओं के कारण, वसंत की शोभा भी नई-नई लग रही है । नये-नये अमूल्य वस्त्रों में केसर की नई छींट बन रही है और नित्य नई है शोभा जिनकी ऐसी गोपिकाएं उन्हें धारण किए हैं जिसके परिणाम स्वरूप वियोग की पीड़ा समाप्त हो रही है । [2]
नये-नये रंग के गुलाल, नया बुका और नई रोली को परस्पर फेंक कर उड़ा रहे हैं । मन्द-मन्द नवीन पवन के झोंके चल रहे हैं। वासन्तिक राग-रागनियों के सुमधुर नवीन स्वर जिनसे निकलते हैं, ऐसे वाद्ययन्त्र बज रहे हैं। श्रीभट्टजी कहते हैं कि ऐसी अनेक प्रकार की शोभा से युक्त नाना प्रकार के खेल श्रीयमुनाजी के तीर पर रचे गये हैं । [3]
नव किशोर नव नागरी, नव सब सौंजरू साज।
नव वृन्दावन नव कुसुम, नव बसंत रितुराज॥
(पद) [इकताल, राग-वसंत]
नवल बसंत नवल श्रीवृन्दावन, नवलहि फूले फूल।
नवलहि कान्ह नवल सब गोपी, निरतत एकै तूल॥ [1]
नवलहि साषि जवादि कुंकुमा, नवलहि बसन अमूल।
नवलहि छींट बनी केसर की, मेंटत मनमथ सूल॥ [2]
नवल गुलाल उड़ै रंग बूका, नवल पवन कै झूल।
नवलहि बाजे बाजत श्रीभट्ट, कालिन्दी के कूल॥ [3]
- श्री भट्ट देवाचार्य, युगल शतक (84)
(दोहा)
श्रीवृन्दाबिपिन में सर्वत्र वसन्त की शोभा छायी हुई है। इसमें विहार-परायण श्रीराधा-कृष्ण की जोड़ी नवल है। उनके समीपस्थ सारी साज-सज्जा भी नवल है। श्रीधाम वृन्दावन भी नवल है, नवल कुसुमावलि फूली हुई है तथा ऋतुराज वसन्त भी तो नवल ही है।
(पद)
नवल ऋतुराज वसन्त के आगमन पर श्री धाम वृंदावन नवल प्रतीत हो रहा है एवं समस्त कुसुमावलि नवीन रूप से फूली हुई है । कान्हा भी नवल हैं तथा समस्त गोपियाँ भी नवल हैं । उनके मध्य श्रीवृषभानुनन्दिनी तथा नित्य नव-किशोर श्रीलालजी नृत्य कर रहे हैं। [1]
जवादि की नवीन शाखाओं के कारण, वसंत की शोभा भी नई-नई लग रही है । नये-नये अमूल्य वस्त्रों में केसर की नई छींट बन रही है और नित्य नई है शोभा जिनकी ऐसी गोपिकाएं उन्हें धारण किए हैं जिसके परिणाम स्वरूप वियोग की पीड़ा समाप्त हो रही है । [2]
नये-नये रंग के गुलाल, नया बुका और नई रोली को परस्पर फेंक कर उड़ा रहे हैं । मन्द-मन्द नवीन पवन के झोंके चल रहे हैं। वासन्तिक राग-रागनियों के सुमधुर नवीन स्वर जिनसे निकलते हैं, ऐसे वाद्ययन्त्र बज रहे हैं। श्रीभट्टजी कहते हैं कि ऐसी अनेक प्रकार की शोभा से युक्त नाना प्रकार के खेल श्रीयमुनाजी के तीर पर रचे गये हैं । [3]

