श्री राधे अब तो होरी आनि बनी है - श्री वंशी अली जी, वर्षोत्सव, बसंत के पद (10)

श्री राधे अब तो होरी आनि बनी है - श्री वंशी अली जी, वर्षोत्सव, बसंत के पद (10)

श्री राधे अब तो होरी आनि बनी है
तुम बिन कैसें बीतत हो । [1]
बिन लीने सुधि एरी मेरी मोको
बिरह दबानल जीतति हो ॥ [2]
कासौं खेलो जाय हाय हो
सबसों परी अछीती हो । [3]
का सौं मुख हँसी माड़ि भिड़ाऊँ
जय श्री वंशी परी अनीती हो ॥ [4]

- श्री वंशी अली जी, वर्षोत्सव, बसंत के पद (10)

हे श्री राधे, होली का पर्व आ गया है, परंतु आपके बिना मेरा हृदय सूना पड़ा हुआ है। आपके मिले बिना, मैं इस उत्सव को कैसे बिताऊँ? [1]

हे मेरी स्वामिनी, जब तक आप मेरी सुधि नहीं लेंगी, तब तक मेरे हृदय में विरह की दावानल अग्नि जलती ही रहेगी। इस जलन से मैं कैसे उबर पाऊँगा? [2]

हाय! मैं आपके अतिरिक्त किसके साथ जाकर होली खेलूँ? मैं तो सभी की दृष्टि से विस्मृत एवं उपेक्षित हूँ। [3]

आपके बिना, मैं किसके साथ हँसकर खेलूँ? कौन मेरे मुख पर प्रेम से गुलाल लगाएगा? श्री वंशी अली जी व्याकुल होकर विलाप कर रहे हैं—लगता है मेरे विधान में ही अनीति लिखी है ! [4]