(राग पंचम एवं राग मालकोस)
देखो देखो ब्रजकी बीथिनि बीथिनि खेलत हैं हरि होरी।
गीत विचित्र कोलाहल कौतुक संग सखा लख कोरी॥ [1]
आई झूमि झूमि झुंडन जुरि अगनित गोकुल गोरी।
तिनमें जुवती कदम्ब शिरोमणि राधा नवल किसोरी॥ [2]
छिरकत ग्वालबाल अबलन पर बूका वदन रोरी।
अरुन अकास देखि संध्या भ्रम पुनि मनसा भई बौरी॥ [3]
रपटत चरन कीच अरगजा की केसरी कुंकुम घोरी।
कही न जाय ‘गदाधर’ पै कछु बुधिबल मति भई थोरी॥ [4]
- श्री गदाधर भट्ट, श्री गदाधर भट्ट जी की वाणी (68)
अरी सखी! देखो, ब्रज की हर एक गली में आनंद के सागर स्वयं हरि, प्रेमपूर्वक होली खेल रहे हैं। मधुर गीतों, हास-परिहास और लीलाओं के मध्य, हजारों सखाओं के संग वे रंगों की इस उत्सवमयी रसधारा में मग्न हो रहे हैं। [1]
गोकुल की असंख्य गोपियों की टोलियाँ उल्लास में झूमती हुई चली आ रही हैं। उन समस्त गोपियों में शिरोमणि, नित्य किशोरी, स्वयं श्री राधारानी, अपनी अनुपम छवि के साथ श्री कृष्ण के संग इस रंग-उत्सव की शोभा बढ़ा रही हैं। [2]
ग्वाल-बाल गोपियों के मुख पर अबीर-गुलाल उड़ाते हैं, जिससे सम्पूर्ण आकाश लालिमा से आच्छादित हो उठता है। ऐसा प्रतीत होता है मानो संध्या का समय हो चला हो और उसकी आभा चित्त को मोहित कर रही हो। [3]
सुगंधित चंदन और रंगीन जल में मिश्रित लाल गुलाल जब भूमि पर फैलता है, तब होली खेलने वाले उसमें फिसलकर हँसी-ठिठोली में लीन हो जाते हैं। श्री गदाधर भट्ट जी भावविभोर होकर कहते हैं कि इस अलौकिक होली महोत्सव ने उनकी बुद्धि को विमुग्ध कर लिया है, और वे इस अद्भुत दृश्य का संपूर्ण रूप से वर्णन करने में स्वयं को असमर्थ पाते हैं। [4]
देखो देखो ब्रजकी बीथिनि बीथिनि खेलत हैं हरि होरी।
गीत विचित्र कोलाहल कौतुक संग सखा लख कोरी॥ [1]
आई झूमि झूमि झुंडन जुरि अगनित गोकुल गोरी।
तिनमें जुवती कदम्ब शिरोमणि राधा नवल किसोरी॥ [2]
छिरकत ग्वालबाल अबलन पर बूका वदन रोरी।
अरुन अकास देखि संध्या भ्रम पुनि मनसा भई बौरी॥ [3]
रपटत चरन कीच अरगजा की केसरी कुंकुम घोरी।
कही न जाय ‘गदाधर’ पै कछु बुधिबल मति भई थोरी॥ [4]
- श्री गदाधर भट्ट, श्री गदाधर भट्ट जी की वाणी (68)
अरी सखी! देखो, ब्रज की हर एक गली में आनंद के सागर स्वयं हरि, प्रेमपूर्वक होली खेल रहे हैं। मधुर गीतों, हास-परिहास और लीलाओं के मध्य, हजारों सखाओं के संग वे रंगों की इस उत्सवमयी रसधारा में मग्न हो रहे हैं। [1]
गोकुल की असंख्य गोपियों की टोलियाँ उल्लास में झूमती हुई चली आ रही हैं। उन समस्त गोपियों में शिरोमणि, नित्य किशोरी, स्वयं श्री राधारानी, अपनी अनुपम छवि के साथ श्री कृष्ण के संग इस रंग-उत्सव की शोभा बढ़ा रही हैं। [2]
ग्वाल-बाल गोपियों के मुख पर अबीर-गुलाल उड़ाते हैं, जिससे सम्पूर्ण आकाश लालिमा से आच्छादित हो उठता है। ऐसा प्रतीत होता है मानो संध्या का समय हो चला हो और उसकी आभा चित्त को मोहित कर रही हो। [3]
सुगंधित चंदन और रंगीन जल में मिश्रित लाल गुलाल जब भूमि पर फैलता है, तब होली खेलने वाले उसमें फिसलकर हँसी-ठिठोली में लीन हो जाते हैं। श्री गदाधर भट्ट जी भावविभोर होकर कहते हैं कि इस अलौकिक होली महोत्सव ने उनकी बुद्धि को विमुग्ध कर लिया है, और वे इस अद्भुत दृश्य का संपूर्ण रूप से वर्णन करने में स्वयं को असमर्थ पाते हैं। [4]

