(राग बसंत)
चलि राधा! तोकौं स्याम बुलावै ।
उहै देखि बैनु मधुरे धुनि, तेरौ नामहिं लै लै गावै ॥ [1]
देखौ वृन्दावन की सोभा, ठौर ठौर द्रुम फूलें ।
कोकिल नाद सुनत मन आनन्द, भँवर भ्रमत रस-झूलें ॥ [2]
उन्मद जोवन मदन कुलाहल, यह औसर है नीकौ ।
‘परमानन्द’ प्रभु प्रथम समागम, मिलयौ भावतौ जीकौ ॥ [3]
- श्री परमानन्द दास जी, परमानंद सागर (1194)
सखी श्री राधा से कह रही है—“हे श्री राधे! चलो, तुम्हारे प्रियतम श्यामसुंदर तुम्हें बुला रहे हैं। ज़रा चलकर देखो, वे अपनी वंशी के मधुर स्वरों में तुम्हारे नाम का ही सुमधुर गान कर रहे हैं।” [1]
ज़रा वृंदावन की अनुपम शोभा तो निहारो! वहाँ स्थान-स्थान पर वृक्ष फूले हुए हैं अर्थात् बसन्त का पूर्ण आगमन हो गया है। बसन्त के ऐसे समय कोकिल के पंचम स्वरों को सुनकर मन में हर्ष होता है तथा भँवर रस में उन्मत्त होकर झूम रहे हैं । [2]
यह अवसर अत्यंत सुहावना और मंगलमय है, जहाँ चारों ओर यौवन का उल्लास और काम का कोलाहल अपने चरम पर है। इसलिए, यह प्रियतम श्री कृष्ण से मिलने का सर्वोत्तम क्षण है, जो हृदय को परम सुख और आनंद प्रदान करने वाला है। [3]
चलि राधा! तोकौं स्याम बुलावै ।
उहै देखि बैनु मधुरे धुनि, तेरौ नामहिं लै लै गावै ॥ [1]
देखौ वृन्दावन की सोभा, ठौर ठौर द्रुम फूलें ।
कोकिल नाद सुनत मन आनन्द, भँवर भ्रमत रस-झूलें ॥ [2]
उन्मद जोवन मदन कुलाहल, यह औसर है नीकौ ।
‘परमानन्द’ प्रभु प्रथम समागम, मिलयौ भावतौ जीकौ ॥ [3]
- श्री परमानन्द दास जी, परमानंद सागर (1194)
सखी श्री राधा से कह रही है—“हे श्री राधे! चलो, तुम्हारे प्रियतम श्यामसुंदर तुम्हें बुला रहे हैं। ज़रा चलकर देखो, वे अपनी वंशी के मधुर स्वरों में तुम्हारे नाम का ही सुमधुर गान कर रहे हैं।” [1]
ज़रा वृंदावन की अनुपम शोभा तो निहारो! वहाँ स्थान-स्थान पर वृक्ष फूले हुए हैं अर्थात् बसन्त का पूर्ण आगमन हो गया है। बसन्त के ऐसे समय कोकिल के पंचम स्वरों को सुनकर मन में हर्ष होता है तथा भँवर रस में उन्मत्त होकर झूम रहे हैं । [2]
यह अवसर अत्यंत सुहावना और मंगलमय है, जहाँ चारों ओर यौवन का उल्लास और काम का कोलाहल अपने चरम पर है। इसलिए, यह प्रियतम श्री कृष्ण से मिलने का सर्वोत्तम क्षण है, जो हृदय को परम सुख और आनंद प्रदान करने वाला है। [3]

