होइ अनन्य भजै भगवंत हि - श्री सुंदर जी

होइ अनन्य भजै भगवंत हि - श्री सुंदर जी

(सवैया)
होइ अनन्य भजै भगवंत हि, और कछू उर मैं नहिं राखै । [1]
देवी उ देव जहां लग हैं, डरि कैं तिनसौं कहुं दीन न भाखै ॥ [2]
जोग हु जज्ञ ब्रतादि क्रिया, तिनकौ नहिं तौ सुपिनैं अभिलाखै । [3]
‘सुन्दर’ अमृत पान कियौ तब, तौ कहि कौंन हलाहल चाखै ॥ [4]

- श्री सुंदरदास जी

जब कोई साधक सारे सांसारिक और पारमार्थिक आश्रयों का पूर्णतः त्याग कर, अनन्य भाव से केवल भगवान का भजन करता है, तब वह सच्ची भक्ति का अधिकारी बनता है। [1]

जितने भी देवी-देवता हैं, उनसे भयवश कुछ भी याचना नहीं करता, क्योंकि उसका संपूर्ण भरोसा केवल अपने आराध्य देव पर ही होता है। [2]

योग, यज्ञ, व्रत, तप, तीर्थ आदि आदि क्रियाएँ करने की इच्छा उसे स्वप्न में भी नहीं होती। [3]

श्री सुन्दरदास जी कहते हैं कि ऐसा जीव सदा हरि-रस रूपी अमृत का पान करता रहता है, वह हलाहल विष को कदापि ग्रहण नहीं करता। [4]