(राग बसंत)
ललित बसंत सघन वृंदावन, फूली रही द्रुम बेली।
कुसुमित नव पल्लव नाना रंग, कंज मधुप रस केली ॥ [1]
बिहरत युगल किशोर नवल वर, कंठ कंठ भुज मेली।
श्री राधिका प्रसाद मुदित ललितादिक, सब विधि सकल सहेली॥ [2]
- श्री राधा प्रसाद देव जू
वसंत ऋतु के आगमन से वृंदावन के हरे-भरे वन आनंद से खिल उठे हैं, और लताएँ लहराते हुए झूम रही हैं। नवीन पल्लव एवं रंग-बिरंगे पुष्प प्रस्फुटित हो रहे हैं, कमल और भ्रमर अपनी मधुर रस क्रीड़ा में मग्न हैं। [1]
इस मनोहर वसंत में दिव्य युगल श्री राधा-कृष्ण प्रेममय आलिंगनबद्ध होकर आनंदमग्न विहार कर रहे हैं। श्री राधिकाप्रसाद कहते हैं कि ललिता व अन्य सखियाँ विविध प्रेम सेवा में मग्न होकर हर्षोल्लास से भर उठी हैं। [2]
ललित बसंत सघन वृंदावन, फूली रही द्रुम बेली।
कुसुमित नव पल्लव नाना रंग, कंज मधुप रस केली ॥ [1]
बिहरत युगल किशोर नवल वर, कंठ कंठ भुज मेली।
श्री राधिका प्रसाद मुदित ललितादिक, सब विधि सकल सहेली॥ [2]
- श्री राधा प्रसाद देव जू
वसंत ऋतु के आगमन से वृंदावन के हरे-भरे वन आनंद से खिल उठे हैं, और लताएँ लहराते हुए झूम रही हैं। नवीन पल्लव एवं रंग-बिरंगे पुष्प प्रस्फुटित हो रहे हैं, कमल और भ्रमर अपनी मधुर रस क्रीड़ा में मग्न हैं। [1]
इस मनोहर वसंत में दिव्य युगल श्री राधा-कृष्ण प्रेममय आलिंगनबद्ध होकर आनंदमग्न विहार कर रहे हैं। श्री राधिकाप्रसाद कहते हैं कि ललिता व अन्य सखियाँ विविध प्रेम सेवा में मग्न होकर हर्षोल्लास से भर उठी हैं। [2]

