यह रस रसिकन के लिये, रसिकहि रस बरसंत।
रसिक जौहरी रस रतन, रसिकन ही पै बसंत॥
- श्री प्रेमदास जी (लाल बलबीर जी के भ्राता), श्री प्रेम दास जी की वाणी (106)
प्रिया प्रियतम का यह दिव्य रस रसिकों के लिए ही है, और इस रस की वर्षा भी केवल उन्हीं पर होती है जो वास्तविक रसिक हैं। केवल रसिकजन ही इस अनमोल रस-रत्न के वास्तविक पारखी होते हैं, अत: रसिकों के लिए नित्य ही वसंत होती है ।
रसिक जौहरी रस रतन, रसिकन ही पै बसंत॥
- श्री प्रेमदास जी (लाल बलबीर जी के भ्राता), श्री प्रेम दास जी की वाणी (106)
प्रिया प्रियतम का यह दिव्य रस रसिकों के लिए ही है, और इस रस की वर्षा भी केवल उन्हीं पर होती है जो वास्तविक रसिक हैं। केवल रसिकजन ही इस अनमोल रस-रत्न के वास्तविक पारखी होते हैं, अत: रसिकों के लिए नित्य ही वसंत होती है ।

