आज सखी सेवाकुंज कुंजन ते आवत जू - श्री हित गोपाल दास [सेवा कुञ्ज वाले], निकुंज रस वल्लरी (96)

आज सखी सेवाकुंज कुंजन ते आवत जू - श्री हित गोपाल दास [सेवा कुञ्ज वाले], निकुंज रस वल्लरी (96)

(कवित्त)
आज सखी सेवाकुंज कुंजन ते आवत जू,
प्राण प्यारी प्रीतम के, संग सुखदाई जू। [1]
मधुर-मधुर करें बात, मंद मुस्काय जात,
रस सरसाय आत, प्रीती मन भाई जू॥ [2]
ऐसी अलबेली प्यारी, श्यामा सुखधामा न्यारी,
कौन भाग सखी आज, नैनन लखाई जू। [3]
श्रीगोपालहित, हर लियो चित्त-वित्त,
शरण! छोड़ि जाऊँ कित, कृपा बरसाई जू॥ [4]

- श्री हित गोपाल दास [सेवा कुञ्ज वाले], निकुंज रस वल्लरी (96)

हे सखी! देखो, आज श्री राधा प्यारी अपने प्रियतम श्री कृष्ण के संग सेवाकुंज की सघन लताओं से प्रेम और सुख की अमृतवर्षा करती हुई आ रही हैं। [1]

उनकी मधुर मधुर बातें एवं मधुर हास-परिहास मन को उल्लासित कर रही है, और उनके प्रेमरस की वर्षा से मेरा हृदय आनंदित हो उठा है। [2]

ऐसा कौन-सा सौभाग्य आज उदित हुआ है कि इन नेत्रों से मैंने अलबेली सरकार, श्री श्यामा प्यारी जू के इस अद्भुत और मनोहर स्वरूप का दर्शन कर लिया, जो स्वयं सुख और माधुर्य की निधि हैं! [3]

श्री हित गोपाल दास जी कहते हैं—“श्यामा जू की सुंदर छवि ने मेरे हृदय को चुरा लिया है। उन्होंने मुझ पर ऐसी अनुकंपा बरसाई है कि अब मैं उनकी शरण छोड़कर कहीं और जाने की कल्पना भी नहीं कर सकती।” [4]