(सवैया)
ब्रह्मपुरी शिव जू की पुरी, अरु इन्द्रपुरी हू कहा जिय धारौं । [1]
देव अदेवन की जे पुरी, पुनि नागपुरी मुख तैं न निकारौं ॥ [2]
औरू पुरी भुव-मण्डल की, तिनके सब कितेकहुँ नांव उचारौं । [3]
नागर ये जु कही सो पुरी, सब गोकुल रावर ऊपर वारौं ॥ [4]
- श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह), श्री नागरीदास जी की वाणी, छूटक कवित्त (86)
ब्रह्मलोक, कैलाश और स्वर्गलोक — ये सब चाहे कितने भी महान क्यों न हों, परंतु मेरे हृदय में इनके लिए तनिक भी रुचि नहीं है। [1]
देव, दानव और नागों के लोकों का तो मैं उल्लेख भी अपनी जिह्वा से करना अनुचित मानता हूँ। [2]
इस पृथ्वी पर स्थित अन्य श्रेष्ठ धामों के स्मरण की भी मुझे कोई अभिलाषा नहीं, उनका मैं क्या नाम उच्चारण करूँ । [3]
श्री नागरीदास जी कहते हैं — “इन समस्त लोकों की महिमा गोकुल की दिव्य महिमा के समक्ष गौण प्रतीत होती है। गोकुल तो प्रेम और माधुर्य की पराकाष्ठा है, जिसपर सम्पूर्ण लोकों को न्यौछावर कर देना ही श्रेयस्कर है।” [4]
ब्रह्मपुरी शिव जू की पुरी, अरु इन्द्रपुरी हू कहा जिय धारौं । [1]
देव अदेवन की जे पुरी, पुनि नागपुरी मुख तैं न निकारौं ॥ [2]
औरू पुरी भुव-मण्डल की, तिनके सब कितेकहुँ नांव उचारौं । [3]
नागर ये जु कही सो पुरी, सब गोकुल रावर ऊपर वारौं ॥ [4]
- श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह), श्री नागरीदास जी की वाणी, छूटक कवित्त (86)
ब्रह्मलोक, कैलाश और स्वर्गलोक — ये सब चाहे कितने भी महान क्यों न हों, परंतु मेरे हृदय में इनके लिए तनिक भी रुचि नहीं है। [1]
देव, दानव और नागों के लोकों का तो मैं उल्लेख भी अपनी जिह्वा से करना अनुचित मानता हूँ। [2]
इस पृथ्वी पर स्थित अन्य श्रेष्ठ धामों के स्मरण की भी मुझे कोई अभिलाषा नहीं, उनका मैं क्या नाम उच्चारण करूँ । [3]
श्री नागरीदास जी कहते हैं — “इन समस्त लोकों की महिमा गोकुल की दिव्य महिमा के समक्ष गौण प्रतीत होती है। गोकुल तो प्रेम और माधुर्य की पराकाष्ठा है, जिसपर सम्पूर्ण लोकों को न्यौछावर कर देना ही श्रेयस्कर है।” [4]

