तजि के सब पौरस प्रबल, मानें तन गुण हीन।
बसे निरंतर विपिन में, ज्यों जल जीवन मीन॥
- श्री प्रियादास जी, रसिक मोहिनी (6)
समस्त पौरुष बल और अहंकार का परित्याग करके, स्वयं को गुणहीन और असहाय मानते हुए, श्रीधाम वृंदावन में सदा ऐसे निवास करना चाहिए, जैसे कोई मछली जल में ही वास करती है।
बसे निरंतर विपिन में, ज्यों जल जीवन मीन॥
- श्री प्रियादास जी, रसिक मोहिनी (6)
समस्त पौरुष बल और अहंकार का परित्याग करके, स्वयं को गुणहीन और असहाय मानते हुए, श्रीधाम वृंदावन में सदा ऐसे निवास करना चाहिए, जैसे कोई मछली जल में ही वास करती है।

