बिहारिन दे वृन्दावन वास - श्री सरस माधुरी जी

बिहारिन दे वृन्दावन वास - श्री सरस माधुरी जी

(राग कान्हरा)
बिहारिन दे वृन्दावन वास।
कुँवरि किशोरी स्वामिनि मोरी, विनय सुनो सुखरास॥ [1]
सेवा करूँ कमल पद प्यारी, मनमें यह अभिलास।
हाजिर रहूं हजूर हमेशा, निरखूं रास विलास॥ [2]
अति कृपाल करूणा की मूरति, मोहे राबरी आस ।
‘सरसमाधुरी’ शरण तिहारी, देवो निकुंज निवास॥ [3]

- श्री सरस माधुरी

हे बिहारिनी श्री राधे! कृपा करके मुझे श्री वृंदावन धाम का अति दुर्लभ वास प्रदान करें। हे कुंवरि किशोरीजी, हे मेरी प्यारी स्वामिनीजू, हे आनंद की मूर्ति! कृपा कर मेरी विनम्र प्रार्थना को सुन लीजिए। [1]

मेरी एकमात्र अनन्य अभिलाषा यही है कि मैं आपके चरणकमलों की नित्य सेवा करता रहूँ। सदा आपके सन्मुख रहकर आपकी प्रेममयी सेवा में रत रहूँ, और आपके दिव्य रास-विलास का निरंतर दर्शन करता रहूँ। [2]

हे परम कृपालु, दया की साक्षात मूर्ति! आप ही मेरे एकमात्र आश्रय हैं। श्री सरस माधुरी जी कहते हैं—“मैं पूर्णतः आपकी शरण में हूँ, कृपा कर मुझ पर कृपा करें और मुझे निकुंज में निवास प्रदान करें।” [3]