येहो स्वामिनि गजगामिनि मनभामिनि - ललित किशोरी जी, अभिलाष माधुरी, विनय (84)

येहो स्वामिनि गजगामिनि मनभामिनि - ललित किशोरी जी, अभिलाष माधुरी, विनय (84)

(राग परज)
येहो स्वामिनि गजगामिनि मनभामिनि, रसिया लाल तिहारो। [1]
करुनादीठ नीठ अवलोको, दीनदसा मेरी निरवारो॥ [2]
ललितकिशोरी श्रीवनवीथिन, रेनु बनाय सीस पग धारो। [3]
तरसतहै ब्रज देखनको दृग, याते दुख और कह भारो॥ [4]

- श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (84)

हे मेरी स्वामिनी (श्री राधा), हे गजगामिनी (मस्त हाथी के समान चाल वाली), हे मन को मोहित करने वाली, श्री राधे! प्रियतम रसिक लाल श्री कृष्ण केवल आपके ही हैं और आपके वचनों को ही मानते हैं। [1]

कृपा करके अपनी करुणा भरी दृष्टि मुझ पर डालें और मेरी दीन दशा को हर लें। [2]

हे ललित किशोरी श्री राधे! मुझे वृंदावन के पावन कुंजों की रज बना दो, जिससे आपके चरण-कमल मेरे मस्तक पर विराजमान होकर मुझे कृतार्थ कर दें। यही मेरा परम सौभाग्य होगा। [3]

मेरे नेत्र ब्रज को निहारने के लिए तरस रहे हैं, इस विरह से बढ़कर और कौन सा दुःख हो सकता है? [4]