अति टोंडिकु अति चिकनियाँ - श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धान्त की साखी (139)

अति टोंडिकु अति चिकनियाँ - श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धान्त की साखी (139)

अति टोंडिकु अति चिकनियाँ, अधिक चतुर इतराइ ।
कितहि विभौ कित ठकुरई, जूठनि कौं ललचाई॥ 

- श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धान्त की साखी (139)

ब्रज रस क्षेत्र के ठाकुर (श्री कृष्ण) अपने स्वाभाविक ठाठ-बाठ, अति टोडिक, छैल-छबीले एवं सिरताज स्वरूप से ऐंठ में भरे रहते हैं, परंतु निकुंज के (कुंज बिहारी) स्वरूप में उनके वैभव-ठकुराई की तो हवा भी नहीं है। यहाँ तो वे अति दीन होकर, श्री प्रिया जी (श्री राधा) के चरणों में पड़े रहते हैं एवं उनकी झूठन खाने को ही ललचाते रहते हैं।