आगम ऋतुराज कौ समाज-साज वृन्दावन - श्री शरण बिहारी गोस्वामी जी

आगम ऋतुराज कौ समाज-साज वृन्दावन - श्री शरण बिहारी गोस्वामी जी

(कवित्त)
आगम ऋतुराज कौ समाज-साज वृन्दावन,
नाच रही सोभा हर उपवन-वन-क्यारी की । [1]
अरुनिम नव पात-पात, गात गात गमक उठी,
फूलन सहनाई बजी मधुप महारी की ॥ [2]
फूलन की सेज पे बिराजे पिय-प्यारी, न्यारी,
सखियन की चाव-भरी भीर भाव-भारी की । [3]
हरिदासी फूल भरे फूल सौं वसंत गावैं,
वसंत की बहार में, बहार है बिहारी की ॥ [4]

- श्री शरण बिहारी गोस्वामी जी

ऋतुराज वसंत के भव्य आगमन से वृंदावन अनुपम शोभा से विभूषित होकर आनंद में नृत्य कर रहा है, जिससे प्रत्येक कुंज और उपवन उसकी सुंदरता से भर उठे हैं। [1]

कोमल नवीन पत्ते लालिमा से दमकते हुए मंद-मंद लहरा रहे हैं, जबकि भंवर गुंजायमान होकर शहनाई बजाते हुए फूलों के उत्सव की घोषणा कर रहे हैं। [2]

कोमल पुष्पों की शय्या पर दिव्य युगल, प्रिया-प्रियतम, अद्भुत शोभा में विराजमान हैं, और प्रेम व उल्लास से भरपूर सखियों का समूह उन्हें घेरे हुए है। [3]

श्री हरिदासी सखी, प्रेम में पूर्णत: निमग्न होकर, वसंत के गीत गा रही हैं और सुगंधित पुष्प अर्पित कर रही हैं, क्योंकि इस वसंत महोत्सव की वास्तविक बहार (शोभा) तो श्री बांके बिहारीजी ही हैं। [4]