चलि चलिहि वृंदावन वसंत आयौ -  श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, उत्तरार्ध (326)

चलि चलिहि वृंदावन वसंत आयौ - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, उत्तरार्ध (326)

(राग वसंत)
चलि चलिहि वृंदावन वसंत आयौ।
झूलत फूलनि के झँवरा, मारूत मकरंद उड़ायौ॥ [1]
मधुकर कोकिल कीर केकी मिलि, कोलाहल उपजायौ।
नाँचत श्याम बजावत गावत, राधा राग जमायौ॥ [2]
चोबा चंदन बूका वंदन, लाल गुलाल उड़ायौ।
व्यास स्वामिनी की छवि निरखत, रोम रोम सचु पायौ॥ [3]

- श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, उत्तरार्ध (326)

आओ, चलें! वसंत का वृंदावन में आगमन हो गया है । खिलते हुए फूलों के गुच्छे लहरा रहे हैं, और मंद समीर उनकी मधुर सुगंध दूर-दूर तक बिखेर रही है। [1]

भँवरे, कोयल, तोते और मोर मिलकर हर्षोल्लास से गान कर रहे हैं, श्याम (कृष्ण) नृत्य कर रहे हैं, बाँसुरी बजा रहे हैं, और राधा मधुर राग में गान कर रही हैं। [2]

सुगंधित चंदन, सुरभित अबीर और रंगों की वर्ष से आकाश गुलाल की लाली से भर उठा है। श्री हरिराम व्यास कहते हैं, “मेरी स्वामिनी, श्री राधा की सुंदर छवि को निहारकर, मेरा प्रत्येक रोम आनंद से भर गया है।’ [3]