यह अति लागति है अब नीकौ  - श्री रूप रसिक देवाचार्य

यह अति लागति है अब नीकौ - श्री रूप रसिक देवाचार्य

(राग बसंत)
यह अति लागति है अब नीकौ कंत-कामिनि कौ बसंत। [1]
अरसि परसि बिहरौ बलि एसेइ जाहि देखि दुख नसंत॥ [2]
सहज सौंज सुखदायक सब दिन दंपति-दुति जू लसंत। [3]
‘रूपरसिक’ जन के मन कौ, महाघनरस बन बरसंत॥ [4]

- श्री रूपरसिक देवाचार्य

दिव्य दंपति श्री राधा-कृष्ण का यह बसंतोत्सव अब अतिशय मनमोहक और हृदय को आल्हादित करने वाला प्रतीत होता है। [1]

जब प्रिया-प्रियतम एक-दूसरे का आलिंगन कर विहार करते हैं, तो उनके इन दिव्य दर्शन को निहारकर समस्त दुखों और संतापों का स्वतः ही निवारण हो जाता है। [2]

यह दिव्य युगल हर क्षण अत्यंत सुखदायक हैं, और उनके अंगों की दिव्य कांति अति ही शोभायमान है जिसके समक्ष सब कुछ फीका प्रतीत होता है । [3]

श्री रूप रसिक देवाचार्य जी कहते हैं कि युगल सरकार अपने भक्तों के चित्त को परम रस में पूर्णतः निमग्न कर देने वाले हैं । [4]