(राग कान्हरा व बिलावल)
प्रिया मैं तो हूँ चेरिन की चेरी।
अब तो करूँ सँभार लाड़िली, बहुतक भई अबेरी॥ [1]
निशिदिन विरह सतावत मोको, सुधि अब लेवो सबेरी।
दे दर्शन मन मोहनी श्यामा, तनक न कीजे देरी॥ [2]
तुम बिन मेरे और न कोई, सकल ठौर हो हेरी।
“रूपमाधुरी” ‘सरस’ पियारी, तुम्हें लाज है मेरी॥ [3]
- श्री रूपमाधुरी जी, श्री रूपमाधुरी जी की वाणी, पदावली (125)
हे प्रियाजी (श्री राधे), मैं तो आपकी दासियों की भी दासी हूँ । अब मुझ पर कृपा करें, हे लाड़िली, क्योंकि बहुत अधिक विलंब हो चुका है। [1]
दिन-रात विरह की अग्नि मुझे सताती है—कृपया अब तो मेरा विचार करें। हे मनोहारिणी श्यामा जू! अब और विलंब न करें, कृपा कर अपना दिव्य दर्शन प्रदान करें। [2]
आपके बिना मेरा कोई नहीं, मैंने हर किसी की ओर निहार कर देख लिया है। श्री रूप माधुरी जी कहते हैं, ‘हे सरस माधुरी जी की प्यारी जू! मेरी लाज अब केवल आपके ही हाथ में है।’ [3]
प्रिया मैं तो हूँ चेरिन की चेरी।
अब तो करूँ सँभार लाड़िली, बहुतक भई अबेरी॥ [1]
निशिदिन विरह सतावत मोको, सुधि अब लेवो सबेरी।
दे दर्शन मन मोहनी श्यामा, तनक न कीजे देरी॥ [2]
तुम बिन मेरे और न कोई, सकल ठौर हो हेरी।
“रूपमाधुरी” ‘सरस’ पियारी, तुम्हें लाज है मेरी॥ [3]
- श्री रूपमाधुरी जी, श्री रूपमाधुरी जी की वाणी, पदावली (125)
हे प्रियाजी (श्री राधे), मैं तो आपकी दासियों की भी दासी हूँ । अब मुझ पर कृपा करें, हे लाड़िली, क्योंकि बहुत अधिक विलंब हो चुका है। [1]
दिन-रात विरह की अग्नि मुझे सताती है—कृपया अब तो मेरा विचार करें। हे मनोहारिणी श्यामा जू! अब और विलंब न करें, कृपा कर अपना दिव्य दर्शन प्रदान करें। [2]
आपके बिना मेरा कोई नहीं, मैंने हर किसी की ओर निहार कर देख लिया है। श्री रूप माधुरी जी कहते हैं, ‘हे सरस माधुरी जी की प्यारी जू! मेरी लाज अब केवल आपके ही हाथ में है।’ [3]

