(राग खम्माच)
अँखिया रूपसुधामद मातीं।
बिनदेखे वह युगलसुघरछवि, बहुआतुर अकुलातीं॥ [1]
वानि परी रति चरणकमल की, अव कैसे सचुपातीं।
ललितमाधुरी दरसन दीजै, वाहिको ललसातीं॥ [2]
- श्री ललित माधुरी
मेरी अखियाँ श्री युगल सरकार की रूप-रस माधुरी के मद में पूरी तरह चूर हो गई हैं। बिना युगल छवि के दर्शन किए, ये अत्यंत आतुर हो उठती हैं और निरंतर अकुलाती रहती हैं। [1]
इनका स्वभाव अब पूर्णतः युगल चरणों में ही रम गया है, और इनकी प्रीति सदैव उन्हीं के चरण-कमलों में अर्पित हो चुकी है। अब ये युगल चरणों के बिना एक क्षण भी सुख का अनुभव नहीं कर सकतीं। श्री ललित माधुरी विनम्र निवेदन कर रहे हैं कि “हे श्री युगल सरकार! कृपा करके इन नेत्रों को अपने दिव्य दर्शन प्रदान कर इन्हें कृतार्थ करें क्योंकि यह सदैव उस मधुर स्वरूप के लिए तरसती रहती हैं। [2]
अँखिया रूपसुधामद मातीं।
बिनदेखे वह युगलसुघरछवि, बहुआतुर अकुलातीं॥ [1]
वानि परी रति चरणकमल की, अव कैसे सचुपातीं।
ललितमाधुरी दरसन दीजै, वाहिको ललसातीं॥ [2]
- श्री ललित माधुरी
मेरी अखियाँ श्री युगल सरकार की रूप-रस माधुरी के मद में पूरी तरह चूर हो गई हैं। बिना युगल छवि के दर्शन किए, ये अत्यंत आतुर हो उठती हैं और निरंतर अकुलाती रहती हैं। [1]
इनका स्वभाव अब पूर्णतः युगल चरणों में ही रम गया है, और इनकी प्रीति सदैव उन्हीं के चरण-कमलों में अर्पित हो चुकी है। अब ये युगल चरणों के बिना एक क्षण भी सुख का अनुभव नहीं कर सकतीं। श्री ललित माधुरी विनम्र निवेदन कर रहे हैं कि “हे श्री युगल सरकार! कृपा करके इन नेत्रों को अपने दिव्य दर्शन प्रदान कर इन्हें कृतार्थ करें क्योंकि यह सदैव उस मधुर स्वरूप के लिए तरसती रहती हैं। [2]

